एनिमल रिप्रोडक्शन

पशु प्रजनन

दुधारू पशुओं के प्रजनन का प्रबंधन किसी छोटे या बड़े डेरी उद्यम की सफलता का महत्‍वपूर्ण अंग है । किसी गाय/भैंस से प्रतिवर्ष एक बच्‍चा पैदा कराना प्रत्‍येक डेरी किसान का सपना होता है तथा इस सपने को पूरा करना वास्‍तव में चुनौतीपूर्ण है । हिमिकृत वीर्य से एआई की शुरूआत होने से इस सपने को वास्‍तविकता में लाना और अधिक चुनौतीपूर्ण हो गया है । सफल प्रजनन प्रबंधन कई महत्‍वपूर्ण एवं सुसंगत घटनाओं का परिणाम है । बछियों की जल्‍दी लैंगिक परिपक्‍वता, पशुओं के जल्‍दी गर्मी में आने के लक्षण की अभिव्‍यक्ति, किसानों द्वारा गर्मी की पहचान, एसओपी का(मानक कार्य प्रणाली)  पालन करते हुए रोगमुक्‍त वीर्य द्वारा समय से कृत्रिम गर्भाधान कराना, पूर्ण अवधि तक गर्भावस्‍था की देख-रेख, सामान्‍य प्रसव (ब्‍याने) से बच्‍चा सामान्‍य एवं स्‍वस्‍थ रहता है, ब्‍याने के बाद ऋतु चक्र का फिर से शुरू होना इत्‍यादि कुछ महत्‍वपूर्ण घटनाएं हैं । इस चक्र में किसी भी अवस्‍था पर रूकावट होने से पशु प्रजनन प्रभावित होता है तथा जिससे दूध उत्‍पादन पर प्रभाव पड़ता है ।

अब तक किसानों तक पहुंची तकनीक जिसमें हिमिकृत वीर्य का प्रयोग करके कृत्रिम गर्भाधान कराना सर्वाधिक प्रभावी प्रजनन संबंधी जैव तकनीकी है। हालांकि देश में कम  गर्भ धारण दरों के कारण कम कृत्रिम गर्भाधान कवरेज होने को ध्‍यान में रखते हुए अभी कृत्रिम गर्भाधान (एआई) डिलीवरी प्रणाली में और अधिक प्रसार की आवश्‍यकता है । कवरेज में लक्षित वृद्धि के साथ ताल-मेल बिठाते हुए उच्‍च आनुवंशिक क्षमता वाले सांड़ों से रोगमुक्‍त वीर्य उत्‍पादन को बढ़ाने की आवश्‍यकता है । प्रजनन संबंधी जैव तकनीकों के विकास के क्रम में विभिन्‍न तकनीकें सामने  आईं जैसे – भ्रूण प्रत्‍यारोपण, इन विट्रो निषेचन, सेक्‍स सीमन इत्‍यादि। दूध उत्‍पादन में बढ़ोतरी के लिए इन तकनीकों को अपनाने की आवश्‍यकता है । हालांकि, व्‍यापक प्रचार-प्रसार से पहले, अपनी परिस्थिति के अनुकूल बनाने के लिए इस प्रकार की कई तकनीकों पर पायलेट अध्‍ययन करने के साथ-साथ मानकीकरण की आवश्‍यकता है । अन्‍तत:, प्रजनन से संबंधित सभी प्रयास पशुओं के बेहतर पोषण के सहगामी होने चाहिए क्‍योंकि संतुलित आहार सफल प्रजनन प्रबंधन के लिए पहली शर्त है ।