आणंद पद्धति

 

आणंद पद्धति

आणंद पद्धति की विशिष्टता सहकारी प्रयासों द्वारा किसानों के लाभ और उत्पादकता को अधिकतम स्तर तक पहुंचाना है:

आणंद पद्धति एक एकीकृत सहकारी ढांचा है जो उत्पाद की प्राप्ति, संसाधन तथा  विपणन करता है। व्यावसायिक प्रबंधन की मदद से उत्पादक स्वयं के व्यवसाय की नीतियां तय करते हैं, आधुनिक उत्पादन एवं मार्केटिंग तकनीकें अपनाते हैं और ऐसी सेवाओं का लाभ लेते हैं जिसे वे व्यक्तिगत तौर पर न तो जुटा सकते हैं और न ही उनका प्रबंध कर सकते हैं।

आणंद पद्धति की सफलता का कारण यह है कि इसमें सहकारी संस्थाओं के माध्यम से लोग स्वयं के विकास में शामिल होते हैं और जहां व्यावसायिक लोग उत्पादकों द्वारा चुने गए नेताओं के प्रति उत्तरदायी हैं। संस्थागत ढांचा- ग्रामीण सहकारिताएं, डेरी तथा पशु आहार संयंत्र, राज्य तथा राष्ट्रीय मार्केटिंग- इन सबका स्वामित्व एवं नियंत्रण किसानों के हाथ में है। आणंद पद्धति की सहकारी संस्थाओं ने उत्तरोत्तर, उत्पादकों को ग्राहकों के साथ सीधा जोड़ दिया है।

त्रिस्तरीय ढांचा

ग्राम समिति

आणंद पद्धति की ग्राम डेरी सहकारी समिति (डीसीएस) का गठन दूध उत्पादकों द्वारा किया जाता है। कोई भी उत्पादक एक शेयर खरीद कर और दूध केवल समिति को बेचने की प्रतिबद्धता के साथ इस समिति का सदस्य बन सकता है। प्रत्येक समिति में एक दूध संग्रह केन्द्र होता है, जहां सदस्य रोजाना दूध ले जाते हैं। प्रत्येक सदस्य के दूध की गुणवत्ता की जांच की जाती है और भुगतान दूध में फैट और एस एन एफ के आधार पर किया जाता है। प्रत्येक वर्ष के अंत में, डीसीएस के मुनाफे के एक भाग को प्रत्येक सदस्य को संरक्षण बोनस देने के लिए उपयोग किया जाता है। यह बोनस उसके द्वारा दिए गए दूध की मात्रा पर आधारित होता है।

जिला संघ

जिला सहकारी दूध उत्पादक संघ का स्वामित्व डेरी सहकारी समितियों के पास होता है। संघ समिति का पूरा दूध खरीद लेता है  और उसे संसाधित कर तरल दूध और दूध के उत्पादों की बिक्री करता है। अधिकतर संघ, दूध सहकारी समितियों तथा उनके सदस्यों को मूलभूत सामग्री और सेवाएं उपलब्ध कराते हैं: जैसे – पशु आहार, पशु चिकित्सा देखभाल, कृत्रिम गर्भाधान इत्यादि ताकि दूध उत्पादन की वृद्धि तथा सहकारी व्यवसाय को निरंतर बनाए रखा जा सके। संघ का स्टाफ, डेरी सहकारी समितियों के नेताओं और कर्मचारियों को प्रशिक्षण और परामर्शी सेवाएं उपलब्ध कराता है।

राज्य महासंघ

राज्य के सहकारी दूध उत्पादक संघ राज्य महासंघ का गठन करते हैं जो सदस्य संघों के दूध और उत्पादों की बिक्री के लिए जिम्मेदार होते हैं। कुछ महासंघ पशु आहार का उत्पादन भी करते हैं, और संघों की अन्य गतिविधियों में भी सहयोग देते हैं।