नई पीढ़ी की सहकारिताओं का उत्पादक कंपनी में रूपांतरण

नई पीढ़ी की सहकारिताओं का उत्पादक कंपनी में रूपांतरण

परिचयः
सहकारी संस्थाएं एक प्रकार के संगठन हैं जिनमें दूध उत्पादक स्वेच्छा से शामिल होते हैं तथा अपनी सामूहिक आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक जरूरतों और आकांक्षाओं को पूर्ण करने के लिए स्वायत मंडली बनाते हैं । यह संयुक्त स्वामित्व और लोकतांत्रिक रूप से नियंत्रित उद्यम होता है। एक समूह के रूप में उत्पादक अपने उत्पादों को खरीदने,उनके संसाधन और बेचने से संबंधित उद्यमों का प्रबंधन और स्वामित्व संभालने का प्रयास करते हैं ।

संस्थागत सुधारों की आवश्यकताः
भारत में सहकारी आंदोलन मुख्यतः एक राज्य प्रायोजित मामला रहा है और अधिकांश सहकारी संगठन अभी भी विनियामक वातावरण के तहत संचालित हो रहे हैं।
वर्तमान समय में वैश्वीकरण और उदारीकरण के कारण सामाजिक – आर्थिक और सांस्कृतिक सीमाएं सिकुड़ गई हैं और सहकारी संस्थाएं ग्रामीण और शहरी, श्रम और उद्योग तथा वित्त और वाणिज्य के क्षेत्र में वैश्विक प्रतिस्पर्धा में आ गई हैं। वाणिज्य, बैंकिंग, अंतर्राष्ट्रीय व्यापार और सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में परिवर्तन ने ग्रामीण जनता का जीवन स्तर सुधारने में मदद की है। यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था को क्षेत्रीय, राष्ट्रीय और वैश्विक मांग से जोड़ने के कारण संभव हुआ है।

आज जरूरत है ऐसे संस्थागत सुधारों की जो सहकारिता के बुनियादी सिद्धांतों का पालन करते हुए कंपनियों के कारोबार और विनियामक ढांचे का लाभ ले सकें। साथ ही वे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को उभरते नए अवसरों के साथ जोड़ सके और वर्तमान प्रतिस्पर्धा परिदृश्य में सहकारी संस्थाओं को काम का समान स्तर प्रदान हो। यदि वर्तमान सहकारी उद्यमों को ग्रामीण उत्पादकों की सेवा में बने रहना है तो उन्हें संस्थागत रुप में एक विकल्प की आवश्यकता है, जो वर्तमान कानून के तहत उपलब्ध हैं।

उत्पादक कम्पनियों के लिये विधि निर्माण की तैयारी

उत्पादक कम्पनी के लिये कानून बनाना
इसे ध्यान में रखते हुए, भारत सरकार के कम्पनी कार्य विभाग ने जाने माने अर्थशास्त्री तथा पूर्व केन्द्रीय मंत्री डॉ. वाय के अलघ की अध्यक्षता में एक उच्चस्तरीय समिति गठित की थी जिन्हें निम्नलिखित बिंदुओं की जांच सिफारिशें करनी थीः

  •  एक ऐसा कानून बनाना जिससे सहकारी संस्थाओं का उत्पादक कंपनियों के रूप में समावेश किया जा सके तथा मौजूदा सहकारी संस्थाओं का उत्पादक कंपनियों में रुपांतरण किया जा सके और
  • यह सुनिश्चित करना कि प्रस्तावित कानून कंपनियों के समान ढाँचे के भीतर सहकारिता के मूल सिद्धांतों को सुरक्षित रखे।

इस समिति की सिफारिशों के आधार पर कंपनी (द्वितीय संशोधन) 2001 विधेयक को अंतिम रूप दिया गया और दिसंबर 2002 के दौरान संसद में पेश किया गया। आखिरकार, कंपनी (संशोधन) अधिनियम 2002, 6 फरवरी 2003 को प्रभाव में आया। तब तक कंपनी अधिनियम 1956 (अधिनियम) में केवल तीन प्रकार की कंपनियों को मान्यता मिली थी, जो इस प्रकार हैः-

  • शेयरों द्वारा सीमित देयता (लिमिटेड) कंपनियां (पब्लिक लिमिटेड और प्राइवेट लिमिटेड कंपनियों में उप विभाजित)
  • गारंटी द्वारा सीमित देयता (लिमिटेड) कंपनियां
  • असीमित देयता (अनलिमिटेड) कंपनियां

अधिनियम में संशोधन से एक चौथे संशोधन का समावेश हुआ
‘उत्पादक कम्पनियां”

दुग्ध उत्पादन कंपनियों के गठन का औचित्यः

निजी क्षेत्र, बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियां और खुदरा श्रृंखला अपने कार्यों का तेजी से विस्तार कर रहे हैं और पिछले 15 वर्षों में उन्होंने इतनी क्षमता बना ली है जो सहकारी समितियों ने 30 वर्षों में स्थापित की थी। निजी क्षेत्र का विकास हो रहा है, पर आजीविका और समग्रता के हित में यह जरूरी है कि सहकारी समितियां संगठित क्षेत्र में दूध के व्यापार में अपनी मौजूदा हिस्सेदारी को बनाए रखें ।
इसलिए, मौजूदा डेरी सहकारी समितियों को सुदृढ़ बनाने के लिए महत्त्वपूर्ण और पर्याप्त कार्य किया जा रहा है साथ ही साथ कंपनी अधिनियम के भाग 9ए का उपयोग उत्पादक कंपनियों को बढ़ावा देने के लिए किया जाएगा। यह कानून कंपनियों जैसा ही कानूनी और नियामक ढांचा प्रदान करता है, परंतु सहकार के बुनियादी सिद्धांतों की रक्षा करता है, स्वैच्छिक और खुली सदस्यता, लोकतांत्रिक सदस्य नियंत्रण, सदस्य आर्थिक भागीदारी, स्वायत्तता और स्वतंत्रता।

नई पीढ़ी की सहकारिताएं

उद्देश्यः
जिन क्षेत्रों में जहां सहकारी समितियां नहीं हैं या बहुत कम हैं और दूध की अधिप्राप्ति कम है वहाँ उत्पादक कंपनियों की स्थापना करने के उद्देश्य से एनडीडीबी नई दुग्ध उत्पादन संस्थाओं/नई पीढ़ी की सहकारी समितियों के संवर्धन के माध्यम से संग्रहण तथा संस्था निर्माण पर विचार कर रही है। बाद में कंपनी अधिनियम के तहत इन्हें उत्पादक कंपनी के तौर पर पंजीकृत किया जाएगा।

रूपरेखा और प्रक्रिया:
शुरूआत में उत्पादक कंपनी दूध एकत्र कर प्रोसेसरों को पारस्परिक रुप से सहमत शर्तों पर दूध की आपूर्ति करेगी। भविष्य में उत्पादक कंपनी दूध प्रसंस्करण और विपणन का कार्य कर सकती है।
प्रशिक्षण, क्षमता निर्माण और दूध संग्रहण के लिए ग्रामीण स्तर पर बुनियादी सुविधाओं में निवेश तथा गांवों के समूह के लिए थोक दूध संग्रहण के लिए कैन, ब्ल्क मिल्क कूलर, संबंधित वजन और जांच उपकरण तथा आईटी उपकरण द्वारा दूध अधिप्राप्ति प्रणाली को मजबूत करने और दूध उत्पादक संस्थाओं के माध्यम से सहकारी व्यवसाय के व्यापक प्रचार की एनडीडीबी ने परिकल्पना की है। इसके अपेक्षित परिणाम दूध उत्पादन, दूध उत्पादकों की संख्या और दूध उत्पादक संस्थाओं की संख्या में वृद्धि हुई है क्योंकि इनसे संगठित दूध प्रसंस्करण क्षेत्र की बेहतर पहुँच और बेहतर मूल्य वसूली का लाभ मिलेगा।

पहुँच:
नई पीढ़ी की सहकारिता को बढ़ावा देने में पहला कदम नवंबर 2005 में सौराष्ट्र-कच्छ क्षेत्र से आरंभ कर उठाया गया। एनडीडीबी की एक टीम ने गुजरात राज्य के जूनागढ़ जिले के गांवों में दुग्ध उत्पादकों को दुग्ध उत्पादक संस्थाओं के रूप में संगठित करना शुरू किया, व्यवस्था को ठीक किया गया और यह मॉडल आठ राज्यों में शुरू किया गया। आज आंध्र प्रदेश, बिहार, गुजरात, हरियाणा, महाराष्ट्र, पंजाब, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में बहुत से दुग्ध उत्पादक संस्थान मौजूद हैं । बहुत सी नई पीढ़ी की सहकारिताओं ने आज उत्पादक कम्पनियों का रूप ले लिया है, जिनमें से माही, पायस, सहज, बाणी और श्रीजा कुछ नाम हैं ।